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जाने क्या है मुहर्रम, और क्या है इसका महत्त्व

मुहर्रम इस्लामिक धर्म के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता हैं। मुहर्रम से इस्‍लाम धर्म के नए साल की शुरुआत होती है। यानी कि मुहर्रम का महीना इस्‍लामी साल का पहला महीना होता है। इसे हिजरी के नाम से भी जाना जाता है। बता दे कि हिजरी सन् की शुरुआत इसी महीने से होती है। जानकारी के अनुसार  इस्लाम के चार पवित्र महीनों में इस महीने को भी शामिल किया जाता है। इस बार 21 सितंबर 2018 को मुहर्रम का ये पवित्र त्योहार मनाया जाएगा। लेकिन लोगो का ऐसा कहना होता है कि मुहर्रम का महीना नववर्ष की शुरुआत होने के बावजूद सेलेब्रेशन का नही बल्कि शोक का महीना है और यौमे आशूरा यानी मुहर्रम की दसवीं तारीख़ इस दुःख की इंतहा का दिन है।

 

 

* क्यों मनाते हैं मुहर्रम –

मुहर्रम क्यों मनाया जाता हैं इस वजह को जानने के लिए हमे तारीख के उस हिस्से में जाना होगा जब इस्लामे ख़िलाफ़त में खलीफ़ा का राज था। इस्‍लामी मान्‍यताओं के अनुसार इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था। ऐसा बताया जाता हैं कि अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था। इतना ही नहीं वह ये भी चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसके खेमे में शामिल हो जाएं। लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और इसके बाद उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया था। पैगंबर-ए इस्‍लाम हजरत मोहम्‍मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था। ऐसा माना जाता है कि जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था वह मुहर्रम का ही महीना था।

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वही इस्‍लाम की मान्‍यताओं के अनुसार हजरत इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ 2 मोहर्रम को कर्बला पहुंचे थे। उनके काफिले में छोटे-छोटे बच्‍चे, औरतें और बूढ़े भी थे। यजीद ने हुसैन को मजबूर करने के लिए 7 मोहर्रम को उनके लिए पानी बंद कर दिया था। 9 मोहर्रम की रात हुसैन ने रोशनी बुझा दी और कहने लगे, ‘यजीद की सेना बड़ी है और उसके पास एक से बढ़कर एक हथ‍ियार हैं। ऐसे में बचना मुश्किल है। मैं तुम्‍हें यहां से चले जाने की इजाजत देता हूं। मुझे कोई आपत्ति नहीं है।’ जब कुछ देर बाद फिर से रोशनी की गई तो सभी साथी वहीं बैठे थे। कोई भी हुसैन को छोड़कर नहीं गया।

10 मुहर्रम की सुबह हुसैन ने नमाज पढ़ाई। तभी फिर यजीद की सेना ने तीरों की बारिश कर दी। सभी साथी हुसैन को घेरकर खड़े हो गए और वह नमाज पूरी करते रहे। इसके बाद दिन ढलने तक हुसैन के 72 लोग शहीद हो गए, जिनमें उनके छह महीने का बेटा अली असगर और 18 साल का बेटा अली अकबर भी शामिल था। ऐसा बताया जाता है कि यजीद की ओर से पानी बंद किए जाने की वजह से हुसैन के लोगों का प्‍यास के मारे बुरा हाल था। प्‍यास की वजह से उनका सबसे छोटा बेटा अली असगर बेहोश हो गया। वह अपने बेटे को लेकर दरिया के पास गए। उन्‍होंने बादशाह की सेना से बच्‍चे के लिए पानी मांगा, जिसे अनसुना कर दिया गया। यजीद ने हुर्मल नाम के शख्‍स को हुसैन के बेटे का कत्‍ल करने का फरमान दिया। देखते ही देखते उसने तीन नोक वाले तीर से बच्‍चे की गर्दन को लहूलुहान कर दिया। नन्‍हे बच्‍चे ने वहीं पर अपना दम तोड़ दिया। इसके बाद यजीद ने शिम्र नाम के शख्‍स से हुसैन की भी गर्दन कटवा दी।

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* कैसे मनाते है मुहर्रम –

मिली जानकारी के मुताबित शिया समुदाय के लोग इमाम को याद करते हुए इस दिन काले  कपड़े पहन कर अपने आपको तरह तरह की यातनाएं देते हैं जैसे अपनी पीठ को तलवार और छूरें आदि से अपने आपको कष्ट देते है। ऐसा लोग इसलिए करते है ताकि हुसैन और उनके साथियो की दी गई यातना को महसूस कर सकें। इतना ही नहीं बता दे कि मुहर्रम के दौरान मुस्लिम समुदाय इस दिन जुलूस के तौर पर ताजिया निकालते हैं। 10 मुहर्रम के दिन लोग काले कपड़े पहनते हैं और कर्बला के मैदान में शहीद हुए इमाम हुसैन सहित साथियो को याद करते हैं। ये कहना गलत नहीं होगा कि मोहर्रम खुशियों का त्‍योहार नहीं बल्‍कि मातम और आंसू बहाने का महीना है।

 

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