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सियासत इसी का नाम है…

पहले ट्रिपल तलाक़ फिर अनुच्छेद 370 और अब सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर पर रोज़ाना सुनवाई। सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर विवाद पर रोज़ाना सुनवाई के फ़ैसले के बाद से अब हर तरफ चर्चा है कि मोदी सरकार का अगला कदम राम मंदिर निर्माण ही है। ये फ़ैसला भी कई सांसदों और सियासी पार्टियों के लिए चिंता का सबब है।

ट्रिपल तलाक़ और अनुच्छेद 370 पर मोदी सरकार को कहीं विरोधी दलों का समर्थन मिला तो कहीं बीजेपी समर्थन वाली पार्टियों का विरोध। ये दोनों मुद्दे बहुत संवेदनशील थे इसलिए ज़्यादातर सांसदों ने इस पर जनता की भावनाओं को देखते हुए अपनी पार्टी लाइन से हटकर राय दी क्योंकि इसके बाद उन्हें दोबारा जनता के बीच भी जाना है। इसमें ज़्यादातर ने अपनी राय खुलकर व्यक्त की मगर कुछ पार्टी और सांसद कश्मकश में रहे। ऐसे में न तो वे सरकार का खुलकर विरोध कर सके और न ही समर्थन। ऐसे सांसदों और पार्टियों ने सदन से वाकआउट का रास्ता अपनाया। हालांकि वाकआउट करके भी उन्होंने परोक्ष रूप से सरकार का समर्थन ही किया। मगर जनता के सामने वो ये कह सकते हैं कि हम सरकार के साथ नहीं थे। इसी का नाम सियासत है।

कई नेता ऐसे मौकों की फ़िराक़ में रहते हैं। ये उनके लिए पाला बदलने का सुनहरा अवसर होता है। हालांकि आज के दौर में विचारों की राजनीति करने वाले कितने नेता हैं इसे बताने से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ने वाला। वो नेता ही क्या जो वक़्त के मुताबिक अपना स्टैंड न बदले और फिर जनता के सामने उसे जायज़ न साबित कर दे।

भारतीय राजनीति के शुरुआती दौर में नेताओं की पहचान उनके विचार और पार्टी से होती थी। लेकिन धीरे-धीरे समय बदलता गया और राजनीति सत्ता केंद्रित होती गयी और जब जनता ने किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं दिया तो दौर आया साझा सरकारों का। ऐसे में कई दलों ने मिलकर सरकार बनायीं केंद्र में भी और राज्यों में भी। जाहिर है सारे दलों या पार्टियों के विचार एक नहीं थे मगर फिर भी वे साथ-साथ थे। ऐसे में एक मात्र कारण, जो इन सबको एक माला में पिरोए हुए था वो थी सत्ता, जिसे हर कोई हासिल करना चाहता था। ऐसे नेताओं को सत्ता के लिए जितने भी सिद्धांतों की कुर्बानी देनी पड़े या यूँ कहे कि कम्प्रोमाइज़ करना पड़े वो ज़र्रा मात्र भी नहीं हिचकते। भारतीय राजनीति में ऐसे नेताओं की भरमार है। इसमें कुछ नेता हमेशा चुनावों से पहले पाला बदलते हैं। जो दरअसल ये संकेत देते हैं कि अब सत्ता किसके हाथ में जाने वाली है। ऐसे नेताओं को weather cock (मौसम बताने वाला मुर्गा) कहते हैं। आपको ऐसे कई नेता याद आ रहे होंगे जो हर बार मंत्री के रूप में दिखाई देते हैं चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो।

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इस बार संसद के सत्र में कई नेता असमंजस में दिखे। कुछ विपक्षी नेताओं ने ट्रिपल तलाक़ और अनुच्छेद 370 पर मोदी सरकार का समर्थन किया। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने तो पार्टी और पद से इस्तीफ़ा तक दे दिया ज़ाहिर है वो कहीं और बेहतर भविष्य तलाश रहे होंगे। मगर कुछ नेता और उनकी पार्टी पसोपेश में रहे। इसकी वजह भी है क्योंकि वे पार्टी लाइन के कारण खुलकर सरकार का समर्थन नहीं कर सकते लेकिन राज्य में उसी पार्टी के साथ सरकार भी चलानी है। ऐसे में वाकआउट से बेहतर क्या विकल्प हो सकता था।

नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू ने भी यही रास्ता चुना। एक तरफ़ सदन से वाकआउट करके भाजपा से विरोध जताना, दूसरी तरफ़ बिहार में सरकार चलाना जारी रखना और फिर दबी ज़ुबान से समर्थन भी कर देना। अभी राम मंदिर का मुद्दा शेष है और अगले साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। साफ ज़ाहिर है कि नीतीश कुमार ऐसा कोई काम नहीं करने वाले जिससे मुस्लिम वोटरों में उनकी पार्टी के ख़िलाफ़ संकेत जाए। 

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इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि नीतीश कुमार इन मुद्दों पर बीजेपी से गठबंधन तोड़ भी सकते हैं। विधानसभा चुनाव भाजपा से अलग होकर लड़ने का इससे बेहतर मौक़ा उनके लिए नहीं हो सकता है। ऐसा करने पर उनके पास गिनाने के लिए अलग होने की सैद्धांतिक वजहें होंगी। उन्होंने पहले भी अपने पाले कई बार बदले हैं। 2013 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो जाने पर उन्होंने बीजेपी से नाता तोड़ लिया था। जिसके बाद 2014 का लोकसभा चुनाव उन्होंने अकेले लड़ा। फिर 2015 में लालू यादव की पार्टी राजद के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा। शानदार जीत मिली मगर दो साल भी सरकार नहीं चली कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजद से रिश्ता तोड़कर दोबारा बीजेपी से मिल गए।

अब परिस्थितियां कुछ अलग हैं फिलहाल बीजेपी को केन्द्र में उनकी कोई ज़रूरत नहीं है। हालांकि बिहार में बीजेपी अपने दम पे सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुई है मगर जिस तरह से बीजेपी बढ़ रही है उससे तो लगता है कि वो बिहार में भी अकेले चुनाव लड़कर ज़्यादा से ज़्यादा सीट हासिल करना चाहेगी। अब सवाल उठता है कि ऐसे में नीतीश कुमार के पास करने को बचा क्या है, बीजेपी का हाथ थामकर आगे बढ़ना या अपनी राहें जुदा कर लेना। इंतज़ार रहेगा ये देखने का कि राजनीति का ऊँट किस करवट बैठता है।

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