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Independence Day: आखिर क्यों अमर शहीद राव रामबख्श सिंह को तीन बार दी गई थी फांसी

बैसवारा के क्रांतिकारी राव राम बख्श सिंह को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। उन्हें एक घंटे तक फांसी पर लटकाने का आदेश हुआ था। 17 दिसंबर 1858 को फांसी पर लटकाने के आदेश के एक साल 11 दिन बाद 28 दिसंबर 1859 को राव साहब को उसी जगह पर फांसी दी गई, जहां उन्होंने अंग्रेजों को मारा था।

दरअसल 29 जून 1857 को राव राम बख्श सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारी जान बचाने के लिए डिल्लेश्वर मंदिर में घुसे थे। परिस्थिति ऐसी बनी कि 12 अंग्रेज जिंदा जला दिए गए। इसमें जनरल डीलाफौस समेत आठ की मौत हो गई थी। इसी के बाद राव साहब को फांसी की सजा सुनाई गई थी। किवदंती है कि राव साहब को फांसी देते वक्त दो बार फंदा टूट गया। इस पर राव साहब ने गले में पड़ी भोले शंकर के नाम की माला खुद से अलग की। तब जाकर अंग्रेज उन्हें फांसी दे पाए थे। राव साहब की इच्छा पर फांसी के दिन ही बक्सर के लंबरदार देशराज सिंह को उनका शव सौंप दिया गया।

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असिस्टेंट कमिश्नर ने जारी किया था प्रमाण पत्र
रायबरेली के असिस्टेंट कमिश्नर सीके क्रेमिलन ने 28 दिसंबर 1859 को राम बख्श सिंह को फांसी देने का प्रमाण पत्र जारी किया था। इसमें लिखा है, ‘आज बुधवार 28 दिसंबर 1859 को गले में फंदा डालकर तब तक लटकाया गया जब तक कि वह मर नहीं गया। उनके शरीर को पूरे एक घंटे तक लटकते रहने पर भी तब तक नीचे नहीं उतारा गया जब तक कि स्वयं मैंने निरीक्षण कर यह नहीं सुनिश्चित कर लिया कि उनके शरीर में प्राण नहीं रहे।

अंग्रेजों ने नष्ट किया डौंडियाखेड़ा का किला
डौंडियाखेड़ा को प्राचीनकाल में द्रोणिक्षेत्र या द्रोणिखेर भी कहा जाता था। अंग्रेजों ने अंतिम राजा राव रामबख्श सिंह को फांसी देने के बाद इस किले पर हमला करके तहस नहस कर दिया। बाद में टूटे फूटे किले को एक दूसरे बैंस राजा दिग्विजय सिंह (मुरारमऊ ) को सौंप दिया। यह किला उन्नाव जिले से 33 मील दूर दक्षिण पूर्व में है, जो 50 फुट उंचे विशाल टीले पर बना था। पश्चिम की ओर गंगा नदी की धारा टीले को छूती बहती है। किले का मुख्य द्वार पूर्व की ओर था। किले की सामने से लंबाई लगभग 385 फुट थी और पीछे का हिस्सा इससे कुछ और अधिक चौड़ा था।

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