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राम भरोसे अर्थव्यवस्था

मौजूदा दौर में चौतरफा मंदी का खतरा है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका में भी मांग की कमी है। विशेषज्ञों ने अगले बर्षों में अमेरिका के मंदी में जाने के संकेत दिये हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता। बल्कि भारत में तो मंदी के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। मांग की कमी है। कई उद्योगों में बेहद सुस्ती है। रियल एस्टेट, बैंकिंग, automobile सेक्टर, टेक्सटाइल उद्योग के साथ ही कंस्यूमर गुड्स भी मंदी की चपेट में हैं।

Automobile sector बेहद ख़राब दौर से  गुज़र रहा है। कई बड़ी कंपनियों ने उत्पादन में कमी की है। जिसका असर इस उद्योग की सहायक कंपनियों पर भी पड़ा है। जब भी किसी बड़े उद्योग पर मार पड़ती है तो उसका दूरगामी असर होता है। एक उद्योग से कई छोटे उद्योग जुड़े होते हैं। जैसे कार बनाने वाली companies बहुत सारे सामान अपनी ancillaries (सहायक कंपनियां) से खरीदती हैं मसलन स्टीयरिंग,नट-बोल्ट, टायर, शीशे, लॉक सिस्टम इत्यादि। जब कार की बिक्री में कमी आती है या डिमांड कम होती है तो इसका परोक्ष रूप से असर दूसरे कामगारों पर भी पड़ता है। जैसा की अब देखने को मिल रहा है। automobile इंडस्ट्री से जुड़े कई और उद्योगों पर भी मंदी की मार पड़ी है। कंपनियों ने प्रोडक्शन घटा दिया है, कई कंपनियों ने कॉस्ट कटिंग के लिए कर्मचारियों की छंटनी भी की है। जिससे बेरोज़गारी का संकट और गहरा रहा है। इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात भी की। उन्होंने उद्योग को मंदी से निकालने के लिए  GST की दरों में कटौती की मांग की, लेकिन अभी तक मंत्रालय की तरफ से कोई संतुष्टि भरा जवाब नहीं आया है। मिला है तो सिर्फ आश्वासन।

टेक्सटाइल इंडस्ट्री भी मंदी से जूझ रही है। देश में कृषि के बाद इसी उद्योग से सबसे ज़्यादा रोज़गार सृजन होता है। टेक्सटाइल मिलर्स की ओर से इंडस्ट्री की खराब हालत पर चिंता व्यक्त की गयी है। जिसमें करोड़ों लोगों की रोजीरोटी पर मंडराते खतरे के बारे में सार्वजनिक चेतावनी दी गयी है। इससे पूरी सप्लाई चेन में खलबली मच गई है। बीते कई महीनों से बिक्री में गिरावट देख रहे टेक्सटाइल ट्रेडर्स का कहना है कि डिमांड घटने से व्यापार में भुगतान संकट भी आ खड़ा हुआ है। मैन्युफैक्चर्स, डिस्ट्रीब्यूटर्स और अन्य सप्लायर्स और डीलर्स को समय पर पैसा नहीं मिल पा रहा है। डिफॉल्ट की शिकायतें भी बढ़ रही हैं। रद्द होने वाले ऑर्डर्स की संख्या भी बढ़ी है। Northern India Textile Mills Association (NITMA) ने एक विज्ञापन के ज़रिये कहा है कि इंडस्ट्री बेहद ख़राब दौर से गुज़र रही है जिससे बड़ी संख्या में रोज़गार घट रहे हैं। सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करके ज़रूरी कदम उठाने की मांग की गयी है।

कंस्यूमर गुड्स में भी मंदी का असर साफ है। बिस्किट बनाने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनी पारले प्रॉडक्ट्स को कन्जंपशन में सुस्ती आने के कारण 8,000-10,000 लोगों की छंटनी करनी पड़ सकती है। कंपनी की तरफ से कहा गया है, ‘हमने 100 रुपये प्रति किलो या उससे कम कीमत वाले बिस्किट पर GST घटाने की मांग की है। अगर सरकार ने हमारी मांग नहीं मानी तो हमें अपनी फैक्टरियों में काम करने वाले 8,000-10,000 लोगों को निकालना पड़ेगा। सेल्स घटने से हमें भारी नुकसान हो रहा है।’ कंपनी का कहना है कि मांग घटने के अलावा आम लोगों के लिए कम मूल्य के उत्पादों पर ऊंचे जीएसटी के प्रभाव की वजह से उसे यह कदम उठाना पड़ सकता है। कंपनी के खुद के 10 कारखाने हैं। इसके अलावा उसकी थर्ड पार्टी वाली 125 इकाइयां हैं। कंपनी के बिस्कुट और अन्य कारोबार में फिलहाल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग एक लाख लोग काम करते हैं। 

रियल एस्टेट का भी कमोबेश यही हाल है। कोई नया निवेश नहीं आ रहा है। बल्कि ग्राहकों ने जो फ्लैट बहुत पहले बुक कराये थे वो उन्हें अब तक नहीं मिले हैं। बिल्डर्स दिवालिया हो रहे हैं, और नये बिल्डर्स मार्केट में निवेश नहीं कर रहे हैं। इससे  फ्लैट ख़रीदारों को भी दोतरफा मार पड़ रही है। एक तरफ मौजूदा मकान का किराया और दूसरे EMI वो भी ऐसे फ्लैट की जिसकी निकट भविष्य में मिलने की कोई उम्मीद नहीं है।

NSE पर लिस्टेड सभी कंपनियों में से 2019 के पहले सात महीनों में 58 CEOs और MDs ने पद छोड़े। एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई क्षेत्रों पर दबाव, उच्चस्तर पर अंडरपरफॉर्मेंस बर्दाश्त नहीं करने, परफॉर्मेंस सुधारने के दबाव और किसी तरह की गड़बड़ी पर सख्ती के कारण इस साल कंपनियों से अधिक संख्या में सीईओ और एमडी बाहर निकले हैं। ग्रोथ सुस्त पड़ने, लक्ष्य हासिल करने या डिसरप्शन के कारण आज सीईओ का काम और चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। इससे कंपनी में शीर्ष पद पर बने रहना मुश्किल हो गया है। CEOs पर आज बहुत दबाव है। उन्हें बोर्ड, निवेशकों और शेयरहोल्डर्स सबके दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

रुपया रोज़ गिरावट के नए रिकॉर्ड बना रहा है। रूपये में कमज़ोरी का सीधा असर आयात पर पड़ रहा है। कमज़ोर रूपये के कारण आयात में ज़्यादा मुद्रा ख़र्च करनी पड़ रही है। लिहाजा चीज़ों के दाम बढ़ हैं।

अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी होने का असर अब कंपनियों के प्रदर्शन पर भी दिखने लगा है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कंपनियों के राजस्व और मुनाफे में तेज गिरावट देखने को मिली है। सबसे ज्यादा असर कंपनियों के मुनाफे पर हुआ है। बीते साल में मुनाफे की वृद्धि दर 24.6 फीसद रही थी जो इस साल घटकर मात्र 6.6 फीसद रह गई है।

अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए रिज़र्व बैंक ने कई बार रेपो रेट्स में कटौती की है, मगर उसका फायदा बैंकों ने पूरी तरह से ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया। बैंकों का तर्क है कि वो पहले ही बहुत नुकसान में हैं। लिहाज़ा इस मौके को बैंक ग्राहकों को न देकर अपना NPA कम करने में लगा रही हैं। जिसका परिणाम ये हुआ है कि तमाम कोशिशों के बाद भी बजार में डिमांड नहीं बढ़ रही है। 

अर्थव्यवस्था से जुड़ी हरतरफ से रोज़ नयी बुरी खबरें आ रही हैं। कर्मचारी रोज़गार जाने के परेशान हैं। कंपनियां मांग घटने और मुनाफा कम होने से चिंतित हैं। आम आदमी से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनी तक हर कोई परेशान है। ऐसे में अगर कोई संतुष्ट नज़र आ रहा है तो वो है हमारी सरकार। सरकार से जब भी इस बारे में पूछा जाता है तो जवाब आता है ‘सब कुछ ठीक है, थोड़ी दिक्कतें हैं जो जल्द दूर हो जाएंगी’। ऐसे में अगर कहा जाये कि भारत की अर्थव्यवस्था राम भरोसे चल रही है तो गलत नहीं होगा।

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