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इतना जरुरी क्यों है रूस को 1 अरब डॉलर का कर्ज देना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20वें भारत-रूस वार्षिक सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत के लिए रूस गए थे। उन्होंने वहां ईस्टर्न इकनॉमिक फोरम में भी हिस्सा लिया। भारत ने रूस के संसाधन संपन्न सुदूरी पूर्वी क्षेत्र (फार ईस्ट रीजन) के विकास के लिए 1 अरब डॉलर का कर्ज देने का ऐलान किया है।


वैसे विकास के लिए मदद का हाथ बढ़ाना भारत के लिए कोई नई बात नहीं है। हालांकि, भारत ज्यादातर कर्ज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों को देता है जो आर्थिक रूप से रूस के मुकाबले कमजोर हैं। सॉफ्ट लोन आस-पड़ोस में राजनीतिक दबदबा कायम रखने का एक महत्वपूर्ण राजनियक जरिया रहा है। इससे पड़ोसी देशों, खासकर अफ्रीका में चीन के बढ़ते दबदबे को भी चुनौती मिलती है। कई जरूरतमंद देशों को चीन के कर्ज के जाल में फंसने से बचाने के लिए भी भारत को कर्ज देना पड़ता है।


आज के ज़माने में दो देशों के बीच आर्थिक रिश्ते मज़बूत होने सबसे अहम हैं, उसके बाद ही उनके बीच अन्य संबंध मज़बूत होते हैं। अगर मौजूदा दौर की बात करें तो भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार महज़ 9-10 मिलियन अमरीकी डॉलर का ही है।

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रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन चाहते हैं कि अन्य देश आकर उस इलाके (फार ईस्ट रीजन) में निवेश करें और वहां विकास कार्य हों। नरेंद्र मोदी इसे एक मौके के तौर पर देख रहे हैं। उनका मानना है कि वो भारतीय कंपनियों को वहां निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि उस इलाके में चीन ने बहुत अधिक निवेश किया है, ऐसे में रूस उस इलाके में दूसरे देशों का निवेश भी चाहता है, जिससे उस इलाके में चीन के प्रभाव को कम किया जा सके।


बात अगर राजनितिक कारणों की करें तो ये बात जायज़ जान पड़ती है। मगर ये बात कई विशेषज्ञों और अर्थजगत से जुड़े लोगों के गले नहीं उतर रही है। कारण साफ़ है क्योंकि इस वक़्त ख़ुद भारत की अर्धव्यवस्था सुस्त है और सरकार के प्रयास हैं की कैसे भी ग्रोथ को बढ़ाया जाये जिससे 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल किया जा सके।


विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अर्थव्यवस्था को रफ़्तार देनी है तो सरकार को खर्चों में बढ़ोतरी करनी होगी। मांग की कमी है और अगर ऐसे में सरकार सिस्टम में पैसा डालती है तो डिमांड बढ़ेगी। जब डिमांड बढ़ेगी तो कंपनियां उत्पादन बढ़ाएंगी। जब उत्पादन में बृद्धि की डिमांड आएगी तो रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे। कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था में तेज़ी बिना system में पैसा आये संभव नहीं है। मगर system में पैसा आये कैसे बैंकिंग sector तो पहले ही खस्ताहाल है। अधिकांश बैंक का NPA बहुत बढ़ गया है और banks लोन देने से कतरा रहे हैं। खुद निति आयोग भी ये बात कुबूल कर चुका है कि फाइनेंस सेक्टर में इतना अविश्वास पहले कभी नहीं था। भारत सरकार रिज़र्व बैंक से 1.76 लाख करोड़ रूपये ले रही है। जिससे वह अपने खर्चे पूरे कर सके।

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अब प्रश्न उठता है कि जब अपने खर्चे पूरे करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है, जब खुद की हालत ख़स्ता है तो ऐसे में भारत सरकार रूस को इतनी बढ़ी रकम (1 अरब डॉलर) कैसे और कहाँ से दे रही है। साथ ही सवाल ये भी उठता है की ये इतना ज़रूरी क्यों है। और अगर केंद्र सरकार भारत के पड़ोसियों पर राजनीतिक दबदबा बनाने के लिए यह काम कर रही है तो क्या खुद अपनी स्थिति सुधरने के लिए यह नहीं किया जा सकता।

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