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‘ऑटो सेक्टर में मंदी की ज़िम्मेदार हैं ओला और ऊबर’

बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई

ग़ालिब का लिखा ये शेर यूं ही याद गया, दरअसल वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे होने पर चेन्नई में पत्रकारों से मुख़ातिब थीं। चूंकि देश आर्थिक मंदी से जूझ रहा है और ऑटो इंडस्ट्री से बुरी ख़बर आयी कि 21 सालों में बिक्री ने गिरावट का रिकॉर्ड तोड़ा है। ऐसे में देश की वित्तमंत्री होने के नाते उनसे सवाल तो बनता है। लेकिन इसके जवाब में उन्होंने जो कहा है उसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं होगी।
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑटोमोबाइल सेक्टर में चल रही गिरावट के पीछे ओला और ऊबर कैब सर्विस को ज़िम्मेदार ठहराया है।


वित्त मंत्री ने एक सवाल के जवाब में कहा, ”ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पर बीएस6 और लोगों की सोच में आए बदलाव का असर पड़ रहा है, लोग अब गाड़ी खरीदने की बजाय ओला या ऊबर को तरजीह दे रहे हैं।”

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अब ज़ाहिर है कि जब ऐसे जवाब मिलेंगे तो सभी को मौका भी मिलेगा इसके जवाब में और सवाल करने का। विपक्षी पार्टियों सहित तमाम लोग वित्तमंत्री के इस बयान पर प्रतिक्रिया देने लगे।
कांग्रेस नेता संजय झा ने ट्वीट किया, ”2.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को ओला और ऊबर नीचे ला रही है. क्या कूल हैं हम”

कई लोगों ने उनके इस गहन अर्थशास्त्र के ज्ञान पर भी सवाल उठाये। एक यूज़र ने पूछा “वाह निर्मला सीतारमण,वित्तमंत्री आपके अर्थशास्त्र ने तो सबके होश ही उड़ा दिये मा. मंत्री जी ओला उबर देश के कितने शहरों में चलता है? जिससे वाहनों की बिक्री पर प्रभाव पड़ा है. चलिये मान भी लें आपकी बात तो ओला,उबर, से कार की ख़रीद में कमी आयेगी ट्रक की ख़रीदारी क्यों कम हो रही है?”

हालांकि ये मुद्दा बहुत संजीदा है लेकिन लोग उनके इस बयान पर तफ़रीह लेने से नहीं चूके। एक ट्वीटर यूज़र ने लिखा है, ”अच्छा हुआ अरविंद केजरीवाल सरकार की फ्री मेट्रो सेवा शुरू नहीं हुई, वरना इलज़ाम उनपर लगा देते की दिल्ली में मेट्रो फ़्री हो गई है इसलिए लोग गाड़ी नहीं खरीद रहे.”

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लेकिन सवाल अब भी जस का तस है कि सरकार इस मंदी से निपटने के लिए क्या कदम उठा रही है। इस पर वित्तमंत्री का ये जवाब क्या उचित है। क्या ये उनके अर्थशास्त्र के कम ज्ञान को दर्शाता है या ये प्रदर्शित करता है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में जवाबदेही से बचने के लिए कुछ भी बोला जा सकता है। बिना ये सोचे हुए कि उनका ये कहना कितना तार्किक है। तर्क वितर्क तो दूर क्या उन्होंने इस बात की भी परवाह की कि उनके ऐसे कुतर्क से उनके पद और खुद उनकी साख़ पर क्या असर होगा।

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