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‘गुजरात सरकार के लिए नहीं हैं संविधान के कोई मायने’

सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई और जलस्तर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार के साथ-साथ नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी को नोटिस जारी किया है। कोर्ट इस मामले की सुनवाई 26 सितंबर को करेगा। बांध का जलस्तर बढ़ाने के खिलाफ याचिका दाखिल की गई है और लोगों को विस्थापित करने के आदेश देने की गुहार लगाई गई है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े संगठनों की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि अगर जलस्तर बढ़ाया जाता है तो मध्यप्रदेश में 178 और गांव जलसमाधि ले सकते हैं। दरअसल इस बार सरदार सरोवर का जलस्तर पहली बार 137.37 मीटर तक पहुंच गया है। गुजरात सरकार चाहती है कि सरदार सरोवर बांध को 138 मीटर तक भरा जाए, जो उसका आखिरी स्तर है।

मेधा पाटकर ने कहा है कि गुजरात की रूपाणी सरकार ने पहले कहा था कि सरदार सरोवर 15 अक्टूबर तक भरा जाएगा। बाद में इसके लिए 30 सितंबर का समय तय किया गया। ऐसे में मोदी के जन्मदिन से पहले 17 सितंबर को ही बांध कैसे भर गया? उन्होंने कहा कि अब स्पष्ट हो गया है कि गुजरात सरकार के लिए संविधान कोई मायने नहीं रखता।

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वहीं, कई सामाजिक संगठन इसके विरोध में हैं। कहा गया है कि गुजरात सरकार की ओर से सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने के बाद जलस्तर को 138 मीटर से ऊपर ले जाने की चल रही कोशिशों से मध्यप्रदेश के 192 गांव और एक शहर के हजारों परिवार संकट से घिरते जा रहे हैं। सौ गांव तो ऐसे हैं, जहां बांध का बैक वाटर भर रहा है और उन गांवों का अन्य हिस्सों से संपर्क टूट गया है।

मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित सरदार सरोवर बांध में 138.68 मीटर तक पानी का जल भराव किया जाना है। जल स्तर के 131 मीटर से ऊपर जाने के बाद से धार, अलीराजपुर और बड़वानी जिले के गांवों में पानी पहुंचने लगा है।

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