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नेहरू की विरासत ‘आरे’ पर महाराष्ट्र सरकार ने चलायी आरी

मुंबई में जल्द ही मेट्रो शुरू होने वाली है। लेकिन इस मेट्रो के शुरू होने से पहले एक विवाद शुरू हो गया है। जो कि चर्चा में बना हुआ है और अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच चुका है।  

मामला है मुंबई मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए मशहूर ‘आरे’ कॉलोनी में काटे जा रहे पेड़। जिसको लेकर विवाद जारी है। पिछले एक हफ्ते से मायानगरी की सड़कों पर प्रदर्शन चल रहा है, इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दखल देते हुए पेड़ों की कटाई पर तुरंत रोक लगा दी है और महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा है।

आरे कॉलोनी के विवाद आज का नहीं बल्कि काफी पुराना है फिर चाहे जंगल एरिया हो या फिर इको जोन, इसका जगह का इतिहास भी एभ्द दिलचस्प है। इस कॉलोनी की नींव देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने रखी थी और यहां पेड़ भी लगाया था।

1947 में देश को मिली आजादी के चार साल बाद 4 मार्च 1951 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पौधारोपण कर डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आरे मिल्क कॉलोनी की नींव रखी। PM नेहरू के यहां पौधारोपण के बाद इस इलाके में इतने पेड़ रोपे गए कि 3166 एकड़ क्षेत्रफल में फैले भूभाग ने कुछ ही समय में जंगल का रूप ले लिया।

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आरे मिल्क कॉलोनी में मुंबई के कई इलाके आते हैं, जिनमें साई, गुंडगाव, फिल्म सिटी, रॉयल पॉल्म, आरे, पहाड़ी गोरेगांव, पसपोली इलाका शामिल है। इस क्षेत्र में कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है, रात में यहां के कुछ रास्तों से निकलने पर रोक भी लगाई गई है।

दरअसल मुंबई की जरूरत को देखते हुए यहां पर मेट्रो चलाने की प्‍लानिंग की गई थी। इसका ही विस्‍तार था वर्सोवा से घाटकोपर, जो वर्ष 2004 में शुरू किया गया था। इसके लिए पार्किंग शेड की जरूरत थी। इसके लिए किसी जगह पर कंपनी के फ्लोर स्‍पेस इंडेक्‍स का निर्माण करना था। मेट्रो से जुड़ी इस एजेंसी को इसके लिए आरे कॉलोनी का यह जंगल सही लगा। लेकिन यह शुरुआत से ही विवादों में घिर गया था क्‍योंकि स्‍थानीय लोगों ने इसका जबरदस्‍त विरोध किया, जिसके बाद महाराष्‍ट्र सरकार ने कंपनी को नई जगह तलाशने का निर्देश दिया था।

लेकिन, कोई नई जगह न मिलने के बाद आरे कालोनी का ही रुख दोबारा भी किया गया और पेड़ों की कटाई का काम शुरू किया गया। यहां के लोगों ने महाराष्‍ट्र हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वहां से सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया गया, जिसके बाद यहां पर पेड़ों की कटाई दोबारा शुरू कर दी गई। यहां पर कंपनी को अपने लायक जगह बनाने के लिए 2700 से अधिक पेड़ों की कटाई करनी थी। आपको बता दें कि हाईकोर्ट से निराश होने से पहले यहां के लोगों को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) से भी हार का ही मुंह देखना पड़ा था। हाईकोर्ट की बात करें तो उसने इसको जंगल मानने से ही इनकार कर दिया था और सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया था। 

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बॉम्बे हाईकोर्ट से महाराष्ट्र सरकार को इजाजत मिली तो तुरंत पेड़ कटाई का काम शुरू हो गया। कुल 2600 के करीब पेड़ काटे जाने थे, जिनमें 2000 से अधिक पेड़ कट भी गए थे। लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से तुरंत पेड़ों की कटाई रोकने को कह दिया, साथ ही ये भी रिकॉर्ड मांगा कि अभी तक कितने पेड़ काटे गए हैं। हालांकि, महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि मेट्रो के लिए उन्हें जितने पेड़ काटने थे, वह काट लिए गए हैं। आगे वह कोई पेड़ नहीं काटेंगे।

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