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अब वित्त मंत्री ने भी माना मुश्किल दौर में है भारतीय अर्थव्यवस्था

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने माना कि विश्व के साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर से गुजर रही है। अर्थव्यवस्था में कितनी सुस्ती है और यह किन वजह से हो रही है, इस पर चिंतन करने की जरूरत है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक किताब का विमोचन करते हुए कहा कि इसको पढ़ने के बाद लोगों को सही मायनें में पता चलेगा कि क्या कारण हैं, जिनसे ऐसा देखने को मिल रहा है। भारत की विकास दर छह साल के सबसे निचले स्तर पर जून में पहुंच गई थी। मांग में कमी के साथ ही निजी निवेश और वैश्विक बाजारों में व्यापार युद्ध के असर के चलते ऐसा देखने को मिला।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के इस बयान से पहले उनके पति ने भी भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर बड़ा बयान दिया था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति परकला प्रभाकर ने The Hindu अखबार में एक लेख लिखकर मौजूदा आर्थिक हालात पर सरकार को दिशा दिखाने की कोशिश की।

परकला प्रभाकर ने अपने लेख में लिखा कि अर्थव्यवस्था में मंदी को लेकर चौतरफा चिंता का माहौल है। हालांकि सरकार अभी भी ये स्वीकार नहीं कर रही है, मगर एक के बाद एक सेक्टर के आंकड़े ये हाल बयां कर रहे हैं कि स्तिथि क्या है। निजी खपत अपने 18 तिमाहियों के निम्न स्तर पर है। ग्रामीण खपत में शहरी खपत के मुकाबले दोगुनी गिरावट है। GDP की ग्रोथ भी 6 बर्षों के निम्न स्तर पर है। अगर कहीं इजाफा है तो वो है बेरोज़गारी, बेरोज़गारी 45 सालों के चरम पर है। सरकार ने अब तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जिससे ये लगे कि अर्थव्यवस्था पर सरकार की पकड़ है और रणनीतिक रूप से सरकार इससे निपटने में सक्षम है।

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इस समस्या की असली जड़ BJP के अनुभवहीन और नकारात्मक  विचार हैं जो उन्होंने इस देश की अर्थव्यवस्था के बारे में बना रखे हैं। जनसंघ के समय से ही नेहरू के समाजवादी स्वरुप को नकारा गया है। बीजेपी की पूँजीवाद की तरफदारी और मुक्त व्यापार का अभी भी व्यव्हार में परीक्षण होना बाकी है। साथ ही पार्टी की जो भी आर्थिक विचारधारा है वो भी सिर्फ नेहरू के विचारों की राजनैतिक चश्में से आलोचना मात्र से ज़्यादा नहीं है।

साल 1998 से 2004 तक गैर कांग्रेसी सरकार रही। 2004 के चुनाव अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में इंडिया शाइनिंग के नारे पर लड़े गए थे। परिणाम सबके सामने रहा है। तब बीजेपी लोगों को ये विश्वास दिलाने में नाकाम रही कि उसके पास कोई विशिष्ट आर्थिक दर्शन है। हालांकि अब की सरकार इस बारे में ज़्यादा सतर्क है। अब की सरकार ये जानती है की वो आर्थिक मोर्चे पर विफल है इसलिए सरकार राष्ट्रवाद, सुरक्षा जैसे मुद्दों को तरजीह देती है और आर्थिक मुद्दों का कहीं कोई ज़िक्र नहीं करती।

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इससे पहले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि मंदी की वजह से महाराष्ट्र पर असर पड़ा है। ऑटो हब बुरी तरह प्रभावित हुआ  है। हर तीसरा व्यक्ति बेरोजगार है। उन्होंने कहा कि आज किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र पहले नंबर पर है। निवेशक महाराष्ट्र को छोड़कर अन्य राज्यों में शिफ्ट हो रहे हैं। वही इस बयान से पहले भी पूर्व प्रधानमंत्री डॉ। मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि देश में अर्थव्यवस्था की स्थिति लगातर बिगड़ रही है, मगर सरकार इस पर जरा भी गंभीर नहीं है। आने वाले दिनों में हालात किस हद तक खराब हो सकते हैं, सरकार को इसका अहसास तक नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार को इस दिशा में तत्काल जरूरी कदम उठाने चाहिए।

आपको बता दें अर्थव्यवस्था को लेकर विपक्ष के बड़े नेता कई सारे बयान दे चुके हैं लेकिन मोदी सरकार ये मानने को तैयार नहीं थी कि भारत की अर्थव्यवस्था खराब दौर से गुजर रही है।

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