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आधुनिक भारत के निर्माता चाचा नेहरू

आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने के साथ भारत के नव निर्माण, लोकतंत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले बच्चों के चाचा नेहरू और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। जो एक अद्भुत वक्ता, उत्कृष्ट लेखक, इतिहासकार, स्वप्नद्रष्टा और आधुनिक भारत के निर्माता थे।

जवाहर लाल नेहरू बच्चों को बहुत मानते थे। उनका मानना था कि आधुनिक भारत के निर्माण में बच्चों की महत्वपूर्ण भूमिका है और रहेगी। नेहरू बच्चों को सपने देखने और बड़ा होकर उसे दुनियावी समस्याओं के बीच भूलने नहीं बल्कि उसपर अमल करने को प्रेरित करते थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू का बच्चों के प्रति काफी स्नेह था और प्यार से बच्चे उन्हें चाचा कहते थे।

पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को हुआ था और बच्चों से काफी स्नेह होने के कारण इस दिवस को प्रत्येक वर्ष ‘बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

नेहरु एक विराट शख्सियत  

नेहरू की शख्सियत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की उन्हें आप किसी एक रूप में नहीं बाँध सकते। उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलू थे। वे अगर भारत के पहले प्रधानमंत्री न भी होते तब भी उनके किये गए कार्य पूरी दुनिया में याद किये जाते।

पंडित नेहरू भारत की रग-रग से वाकिफ थे। भारत के समाज, दर्शन एवं इतिहास का सम्पूर्ण चित्रण उनके दिमाग में था। उन्होंने जेल में रहकर जिस किताब को लिखा वह सम्पूर्ण भारत के मानस को प्रदर्शित करती है। ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ और ‘ग्लिम्पसेज आफ द वर्ल्ड हिस्ट्री’ पंडित नेहरु की तरफ से दुनिया को एक देन है।

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जवाहर लाल नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता कहना गलत नहीं है ऐसा इसलिए क्योंकि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद खस्ताहाल और विभाजित भारत का नवनिर्माण करना कोई आसान काम नहीं था लेकिन पंचवर्षीय योजना उनकी दूरदृष्टि का ही परिणाम था जिसके नतीजे इतने सालों बाद भी मिल रहे हैं। स्वस्थ लोकतंत्र की नींव रखने और इसे मजबूत बनाने में पंडित नेहरू का महत्वपूर्ण योगदान था।

चीन के साथ दोस्ती की पहल उन्होंने काफी ईमानदारी से की थी और पंचशील और हिन्दी चीनी भाई भाई का नारा दिया लेकिन 1962 में भारत पर चीन के हमले से वह काफी आहत हुए और कुछ लोग इसी को उनके निधन का कारण मानते हैं।

विदेश नीति

जवाहरलाल नेहरु ने भारत की विदेश नीति को एक ऐसे अवसर के रुप में देखा जिसमें वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में स्थापित कर सकें।

उनकी विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा था उनका पंचशील का सिद्धांत जिसमें राष्ट्रीय संप्रभुता बनाए रखना और दूसरे राष्ट्र के मामलों में दखल न देने जैसे पाँच महत्वपूर्ण शांतिसिद्धांत शामिल थे।

भारत के प्रधानमंत्री के रुप में वह चाहते थे कि भारत दोनों महाशक्तियों में से किसी के भी दबाव में न रहे और भारत की अपनी एक स्वतंत्र आवाज़ और पहचान हो।

उन्होंने मुद्दों के आधार पर किसी भी महाशक्ति की आलोचना करने का उदारहण भी रखा।

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यह महत्वपूर्ण था क्योंकि तब तक दुनिया के बहुत से देशों को भारत की आज़ादी पर भरोसा नहीं था और वे सोचते थे कि यह कोई ब्रितानी चाल है और भारत पर असली नियंत्रण तो ब्रिटेन का ही रहेगा।

नेहरु के बयानों और वक्तव्यों ने उन देशों को विश्वास दिलाया कि भारत वास्तव में स्वतंत्र राष्ट्र है और अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपनी एक राय रखता है।

नेहरु की विदेश नीति में दूसरा महत्वपूर्ण बिंदू गुट निरपेक्षता का था।

भारत ने स्पष्ट रुप से कहा कि वह दो महाशक्तियों के बीच झगड़े में नहीं पड़ना चाहता और स्वतंत्र रहना चाहता है। हालांकि इस सिंद्धांत पर नेहरु ने 50 के दशक के शुरुआत में ही अमल शुरु कर दिया था लेकिन “गुट निरपेक्षता” शब्द उनके राजनीतिक जीवन के बाद के हिस्से में 1961 के क़रीब सामने आया।

नेहरु का राष्ट्रप्रेम

आज जब हर तरफ समाज को बांटने की राजनीति हो रही है, नेता समाज को महज़ वोट पाने के लिए बाँट रहे हैं, मगर नेहरु जी के जहन में राष्ट्र क्या था इसे उन्होंने अपनी इच्छा प्रकट करते हुए लिखा था कि “मैं चाहता हूं कि मेरी मुट्ठीभर राख प्रयाग के संगम में बहा दी जाए जो हिन्दुस्तान के दामन को चूमते हुए समंदर में जा मिले, लेकिन मेरी राख का ज्यादा हिस्सा हवाई जहाज से ऊपर ले जाकर खेतों में बिखरा दिया जाए, वो खेत जहां हजारों मेहनतकश इंसान काम में लगे हैं, ताकि मेरे वजूद का हर जर्रा वतन की खाक में मिलकर एक हो जाए।”

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