fbpx

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बताई भारत की आर्थिक बीमारी की जड़

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दू’ में एक लेख लिख कर मोदी सरकार को मौजूदा आर्थिक संकट से निपटने का सूत्र दिया है। साथ ही साथ ये भी बताने की कोशिश की है कि आखिर ये स्थिति आई क्यों।

मनमोहन सिंह ने यह लेख अंग्रेजी में ‘The fountainhead of India’s economic malaise’ नाम के शीर्षक के साथ लिखा है।

इसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लिखा है:-

भारत की अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहद चिंताजनक है। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि मैं विपक्षी दल का सदस्य हूं, बल्कि मैं यह अर्थशास्त्र के छात्र के रूप में और देश के नागरिक के रूप में कह रहा हूँ। अब ये तथ्य सभी के सामने स्पष्ट हो चुके हैं कि GDP विकास दर 15 साल के निम्न स्तर पर है, बेरोज़गारी  45 साल के उच्चतम बिंदु पर है, घरेलू खपत चार-दशक के निम्न स्तर पर है, बैंकों में bad loans उच्च स्तर पर हैं और बिजली उत्पादन में वृद्धि 15 साल के निचले स्तर पर है। ये फेहरिस्त बहुत लंबी है, लेकिन चिंता का कारण ये बिंदु नहीं हैं ये तो महज़ इशारा कर रहे हैं कि असल में अर्थव्यवस्था की हालत कितनी गंभीर है।

देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति भी अपने समाज की स्थिति का प्रतिबिंब है। किसी भी अर्थव्यवस्था का कामकाज अपने लोगों और संस्थानों के बीच आदान-प्रदान और सामाजिक संबंधों का परिणाम होता है। आपसी विश्वास और आत्मविश्वास लोगों के बीच ऐसे सामाजिक लेनदेन का आधार है जो आर्थिक विकास को बढ़ावा देते हैं। इस भरोसे का सामाजिक ताना-बाना अब बिखर रहा है।

ये भी पढ़ें :-  दूसरा टी-20: वेस्टइंडीज के खिलाफ लगातार 7 मैच जीतने के बाद हारा भारत,कोहली बने T-20 में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज

हमारे समाज में आज डर का माहौल है। कई उद्योगपति मुझे बताते हैं कि वे सरकारी अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न के डर में रहते हैं। प्रतिशोध के डर से बैंकर नए लोन लेने से कतरा रहे हैं। असफलता के डर से उद्यमी नए प्रोजेक्ट लगाने में हिचकिचाते हैं। टेक्नोलॉजी स्टार्ट-अप जोकि आर्थिक विकास और नौकरियों का एक महत्वपूर्ण इंजन है, निरंतर निगरानी और संदेह में रहते हैं। सरकार और दूसरे संस्थानों में नीति बनाने वाले सच बोलने और खुल कर किसी भी मुद्दे पर चर्चा करने से बचते हैं। जब इस तरह का अविश्वास होता है, तो यह समाज में आर्थिक लेनदेन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। जब लोगों और संस्थानों के बीच लेन-देन पर नकारात्मक प्रभाव होता है, तो यह स्थिति मंदी की ओर ले जाती है। नागरिकों के बीच भय, अविश्वास और विश्वास की कमी आर्थिक मंदी का एक मूल कारण है।

इसके अलावा लाचारी का माहौल है। जितने भी त्रस्त नागरिक हैं उनके पास और कोई चारा नहीं है। मीडिया, न्यायपालिका, नियामक अधिकारियों और जांच एजेंसियों जैसे स्वतंत्र संस्थानों पर से जनता का भरोसा उठता जा रहा है। विश्वास के खत्म होने के साथ साथ विभिन्न प्रकार के tax से परेशान लोगों को समर्थन और सहायता की भी कमी है। इसी वजह से नए entrepreneurs में रिस्क लेने की क्षमता घटती जा रही है  और यही वजह है की रोज़गार कम सृजित हो रहे हैं। अविश्वास और डर के इस माहौल की वजह से ही अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब होती जा रही है।

ये भी पढ़ें :-  उन्नाव कांड: जिंदा जलाई गयी गैंगरेप पीड़िता की हालत गंभीर

सामाजिक ताने बाने के टूटने का एक और कारण ये है की सरकार की नज़र में हर उद्योग धंधा करने वाले, बैंकर, पॉलिसी मेकर आदि सभी सरकार को धोखा दे रहे हैं। इस धारणा ने भी आर्थिक विकास को जाम कर दिया है।

मोदी सरकार ने हर किसी को संदेह के नज़रिये से देखा।  इस सरकार को पूर्व सरकार के हर काम में सिर्फ दोष नज़र आये। और सरकार ने जो मूर्खतापूर्ण नैतिक-पुलिसिंग नीतियों का सहारा ले कर जो कार्य किये जैसे कि नोटबंदी वो विनाशकारी साबित हुआ है। हर किसी को गलत साबित करके अच्छे और बुरे शासन की नीति आर्थिक विकास का सिद्धांत नहीं हो सकती।

आर्थिक विकास में सामाजिक विशवास की भूमिका को शुरू से जगह दी गयी है एडम स्मिथ के ज़माने से आज तक ये व्यवहारिक है। इस सामाजिक ताने बाने का टूटना ही आर्थिक मंदी की जड़ है। आर्थिक विश्वास को दोबारा जगाने के लिए ये आवश्यक है की सामाजिक ताने बाने के विश्वास को कायम किया जाए।

फिलहाल अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता का माहौल है, हर तरफ गिरावट के आंकड़े आ रहे हैं, लोग खपत को पूरा करने के लिए अपनी जमा पूंजी लगा रहे हैं। जो थोड़ी बहुत जीडीपी ग्रोथ है वह भी सिर्फ क्रीमी लेयर में हो रही है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.