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सरकार को नहीं पता आखिर कौन होते हैं किसान

भारत एक कृषि प्रधान देश है। अधिकतर किताबों में जब भी भारत के बारे बताया जाता है तो शुरुआत इसी वाक्य से होती है, मगर विडंबना देखिये हमारी सरकार को ये ही नहीं पता है कि किसान होता कौन है। सरकार के पास इसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है कि आखिर कौन किसान है या फिर किसे किसान कहा जा सकता है। सरकार के पास अब तक इस बात की भी सही जानकारी नहीं है कि पूरे देश में कुल कितने किसान हैं।

किसान की संख्या पता नहीं होने और इसकी सही परिभाषा नहीं तय किए जाने की वजह से मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी पीएम-किसान जैसी योजनायें सही तरीके से लागू नहीं हो पा रही हैं और कई योग्य लाभार्थियों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

2007 में कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक रिपोर्ट सौंपी गई थी इस रिपोर्ट में ‘किसानों की राष्ट्रीय नीति’ के मुताबिक ‘किसान’ उस व्यक्ति को माना जाएगा जो कृषि वस्तुओं का उत्पादन करता है।

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इसके मुताबिक किसान की परिभाषा में सभी कृषि जोतदारों, कृषक, कृषि मजदूर, बटाईदार (साझेदारी में खेती करने वाले), पट्टेदार, मुर्गी पालन और पशु पालन करने वाले,  मछुआरे, मधुमक्खी पालनेवाले,  माली,  चरवाहे, गैर-कॉरपोरेट बागान मालिकों और रोपण मजदूरों के साथ-साथ विभिन्न कृषि-संबंधित व्यवसायों जैसे सेरीकल्चर, वर्मीकल्चर और कृषि वानिकी में लगे व्यक्ति शामिल हैं।

इस रिपोर्ट को स्वामीनाथन रिपोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। ये रिपोर्ट किसानों की आय बढ़ाने और उनके लिए सेवाएं विकसित करने पर जोर देती है। हालांकि अभी तक केंद्र सरकार ने इसे पूरी तरह से लागू नहीं किया है।

किसानों की सही संख्या का पता नहीं होने का ही परिणाम है कि वित्त वर्ष 2019-20 के पहले सात महीनों में पीएम-किसान योजना की सिर्फ 37 फीसदी धनराशि ही खर्च हो पाई है।

पीएम-किसान के लिए 75,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। फिलहाल अक्टूबर अंत तक इस योजना के तहत कुल 27,937.26 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। हालांकि इस वित्त वर्ष को पूरा होने में करीब चार महीने ही बचे हैं फिर भी हालात को देख कर ये कहा जा सकता है कि आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार खर्च नहीं कर पाएगी। अनुमान है कि पीएम-किसान की 30 फीसदी राशि खर्च नहीं हो पाएगी और इसकी वजह ये है कि केंद्र को किसानों की कुल संख्या का पता ही नहीं है।

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