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सुलगता-जलता नॉर्थ-ईस्ट, क्या यही है BJP की एक्ट ईस्ट पॉलिसी

CAA लागू हो गया है और इसके खिलाफ प्रदर्शन भी जारी हैं। CAA के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन की चिंगारी उत्तर-पूर्व में ही सुलगी थी जिसने आगे चलकर विकराल रूप ले लिया।

सरकार इससे अपने एक बड़े सियासी फायदे के रूप में देख रही है। निश्चित तौर पर ये BJP के लिए फायदेमंद हो सकता है, मगर क्या ये भारत के लिए भी उतना ही फायदेमंद है? मौजूदा समय में यह एक बड़ा प्रश्न है।

किसी भी नीति के नफा-नुकसान का सही आंकलन करने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ सही और पर्याप्त समय होता है। हालांकि अभी इसे जल्दी ही कहा जायेगा लेकिन फिर भी अभी भी इसके नुकसान या फायदे के रुख को भांप सकते हैं।

उत्तर-पूर्व के राज्यों में तनाव

उत्तर-पूर्व के राज्यों में तनाव है इसी के चलते कई देश जैसे फ्रांस, अमरीका, ब्रिटेन, इसराइल, कनाडा और सिंगापुर ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है और असम न जाने की सलाह दी है। जाहिर है इससे ये साबित होता है कि CAA का प्रभाव सिर्फ भारत का आंतरिक मसला नहीं रहा है क्योंकि इससे और देशों के साथ संबंध भी प्रभावित हो रहे हैं।

लुक इस्ट पॉलिसी (Look East Policy)

1991 में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने भारत की पूरब की ओर देखो नीति अर्थात लुक इस्ट पॉलिसी शुरू की थी।

इस नीति का मुख्य लक्ष्य भारत के व्यापार की दिशा को पश्चिमी देशों से हटाकर उभरते हुए दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की ओर ले जाना था।

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साथ ही भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और पड़ोसी देशों बीच मधुर संबंध विकसित करना था ताकि व्यापार-वाणिज्य के ज़रिए इस क्षेत्र का विकास किया जा सके।

एक्ट इस्ट पॉलिसी (Act East Policy)

मोदी सरकार आने के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि लुक इस्ट पॉलिसी की बजाय उनकी सरकार एक्ट इस्टपॉलिसी में विश्वास रखती हैं और इसके लिए पूर्वोत्तर के राज्य बेहद अहम हैं। सरकार का इरादा उत्तर-पूर्व के ज़रिए पूर्वी एशियाई देशों के साथ कारोबार बढ़ाने का था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा था कि वो पूर्वोत्तर भारत को एक द्वार(gateway) की तरह विकसित कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ”नॉर्थ इस्ट इंडिया को हम साउथ इस्ट एशिया के गेटवे के तौर पर डेवेलप कर रहे हैं। भारत का ये हिस्सा हमारी एक्ट इस्ट पॉलिसी और थाइलैंड की एक्ट वेस्ट पॉलिसी, दोनों को ताक़त देगा।”

एक्ट इस्ट पॉलिसी पर CAA का असर

नागरिकता संशोधन क़ानून(CAA) और इनर लाइन परमिट को लेकर पिछले कुछ दिनों से असम तथा पूर्वोतर के कई राज्य में हो रहे विरोध से अशांति के हालात उत्पन्न हुए हैं। ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि पूर्वोत्तर भारत में शांति स्थापित किए बिना इस इलाक़े को साउथ इस्ट एशिया के गेटवे के तौर विकसित करना संभव हो पायेगा?

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असम वित्तीय निगम के अध्यक्ष और असम प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता का कहना है कि नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध से पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण पूर्व एशिया के गेटवे(द्वार) के तौर पर विकसित करने के प्रयास को झटका लगा है।

उनका कहना है, “हमारी सरकार ने मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में रेल-सड़क और एयर कनेक्टिविटी के क्षेत्र में बहुत काम किया है। दक्षिण पूर्व एशिया के साथ कनेक्टिविटी को विकसित करने की दिशा में हम काफ़ी आगे बढ़ रहे थे लेकिन CAA के विरोध से हमें काफ़ी नुक़सान हुआ है।“

विजय कुमार ने सवाल उठाते हुए कहा, “हमारी सरकार ने निवेशकों के लिए जो समिट का आयोजन किया था उस समय काफ़ी लोगों ने यहां उद्योग लगाने और निवेश करने की इच्छा जाहिर की थी। मगर अब जो हालात हैं, ऐसे में कौन अपने पैसे यहां निवेश करना चाहेगा।”

BJP नेता की ये आशंका अकारण नहीं है। CAA के ख़िलाफ विरोध से जो हालात पैदा हुए हैं उसमें कौन इस क्षेत्र में निवेश करेगा। क्या कोई व्यापारी ऐसे क्षेत्र से अपना माल दक्षिणपूर्व एशिया में भेजेना चाहेगा, जहां हिंसा हो रही हो। जाहिर है ऐसे में जिसे अपना सामान दक्षिणपूर्व एशिया में भेजना होगा वो समुद्र के रास्ते को चुनेगा क्योंकि वह सुरक्षित रास्ता होगा।

किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए पहली जरूरत है कि वहां शांति हो। मगर अब तीर कमान से निकल चुका है। अब जबकि ये क्षेत्र अशांत और सियासी अखाडा बन चुका है तो संदेह पैदा होता है कि मोदी सरकार की एक्ट इस्ट की पॉलिसी भी बाकी पॉलिसी की तरह जुमला बनकर न रह जाए।

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