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हमेशा 14-15 जनवरी को ही क्यों मनाते हैं मकर संक्रांति

मकर संक्रांति एक ऐसा त्यौहार है जो पूरे भारत में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नामों और कई तरीक़ों से मनाया जाता है।

उत्तर भारत में इसे आम तौर पर मकर संक्रांति कहा जाता है, तमिलनाडु में इसे पोंगल के नाम से जाना जाता है जबकि गुजरात में इसे उत्तरायण कहते हैं। असम में इसे माघी बिहू कहते हैं और कर्नाटक में सुग्गी हब्बा, केरल में मकरविक्लु कहा जाता है तो कश्मीर में शिशुर सेंक्रांत। नाम कोई भी हो मगर इसी दिन सब किसी न किसी नाम से सेलिब्रेट करते हैं।

यह त्यौहार भारत ही नहीं, नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी मनाया जाता है। अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से लोग इसे मनाते हैं।

क्या है संक्रांति का मतलब

संक्रांति का मतलब संक्रमण यानी ट्रांजिशन, इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। मकर संक्रांति को उत्तरायण इसलिए भी कहते हैं कि सूरज दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की तरफ़ आना शुरू हो जाता है। यह प्रक्रिया 21 जून तक चलती है जिस दिन सबसे लंबा दिन होता है।
मकर संक्रांति के बाद से दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी, 14-15 जनवरी के बाद से सूर्यास्त का समय धीरे-धीरे आगे खिसकता जाता है।

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सूर्यास्त का समय धीरे-धीरे आगे खिसकने का मतलब है कि सर्दियां कम होंगी और गर्मी बढ़ेगी क्योंकि सूर्य उत्तरी गोलार्ध के सीध में अधिक समय तक रहेगा।

हमेशा 14-15 जनवरी को ही क्यों होती है मकर संक्रांति

भारत में प्रचलित सभी त्योहार हिंदू कैलेंडर के हिसाब से मनाये जाते हैं। भारत का हिन्दू कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित हैं यही वजह है कि हिंदू त्योहारों की तारीख़ बदलती रहती है या यूं कहें की अंग्रेजी कैलेंडर से मैच नहीं करती।

जबकि आम तौर पर हम इस समय जो कैलेंडर इस्तेमाल करते हैं उसे ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं जो सोलर कैलेंडर है यानी सूर्य पर आधारित कैलेंडर है।

मकर संक्रांति एक ऐसा त्योहार है जो सूर्य की स्थिति के हिसाब से मनाया जाता है, यही वजह है कि मकर संक्रांति त्योहार की तारीख अंग्रेजी कैलेंडर से मैच करती है हमारे पारम्परिक चन्द्रमा के कैलेंडर से नहीं।

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