16 मार्च ‘वर्ल्ड वैक्सीनेशन डे’, जानें भारत में वैक्सीन का इतिहास

16 मार्च को वर्ल्ड वैक्सीनेशन (vaccination) डे मनाया जाता है। वैक्सीनेशन यानी टीकाकरण के जरिए छोटे बच्चों को डॉक्टरों द्वारा टीका लगाया जाता है और इसी टीका लगाने की प्रक्रिया को वैक्सीनेशन कहा जाता है। टीकाकरण की मदद से बच्चों को खतरनाक रोगों से सुरक्षित रखा जाता है। जब भी कोई शिशु पैदा होता है तो उसे कई तरह के टीके लगाए जाते हैं। ताकि उसको कोई घातक बीमारी ना हो सके।

किस तरह से काम करता है टीका

सामान्यत: अनेक बीमारियों के संदर्भ में उस रोग के वायरस का शरीर में प्रवेश हो जाने पर बीमारीयाँ पैदा हो जाती हैं। तभी प्रति उत्तर के रूप में इन वायरस का सामना करने हेतु एक प्रतिकारक शक्ति तैयार करती हैं। जो उन वायरस को नष्ट कर देती हैं फिर बच्चे बीमारियों से मुक्त हो जाते हैं। इसमें एक चीज़ हमारी समझ में आती हैं की बच्चे में रोग की शुरुवात होने पर ही रोग प्रतिरोधक क क्षमता सिद्ध हो जाती है।

लुई पाश्चर का सिद्धांत

वैक्सीनेशन शब्द लैटिन भाषा के वैक्सीनस से बना है। जिसका अर्थ होता है गाय या उससे संबंधित। 18वीं सदी के अंत में फ्रांस के महान माइक्रोबॉयोलाजिस्ट लुई पाश्चर ने जर्म थ्योरी ऑफ डिजीज दी। इसी बुनियाद पर चिकेन पॉक्स, कॉलरा, रैबीज और एंथ्रेक्स के टीके विकसित किए।

भारत में सबसे पहले बना वैक्सीन

भारत में 1896 में एक प्लेग महामारी हुई (जिसके कारण 1896 की महामारी अधिनियम लागू हुआ, जो आज भी देश में लागू है)। भारत सरकार ने डॉ हाफकीन से प्लेग वैक्सीन के विकास पर काम करने का अनुरोध किया और उन्हें अपनी प्रयोगशाला स्थापित करने के लिए मुंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज में दो कमरों का एक कमरा उपलब्ध कराया गया। डॉ हाफकीन ने 1897 में प्लेग वैक्सीन विकसित की और यह यकीनन, भारत में विकसित पहला वैक्सीन है। इस प्रयोगशाला को 1899 से प्लेग लेबोरेटरी कहा जाता था, जिसका नाम 1905 में बॉम्बे बैक्टेरियोलॉजिकल लैब रखा गया और आखिरकार 1925 में इसे हाफकीन इंस्टीट्यूट का नाम दिया गया, जैसा कि आज जाना जाता है।

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टीकाकरण की शुरुआत

माना जाता है कि वास्तविक रूप से टीकाकरण का इतिहास अंग्रेज चिकित्सक एडवर्ड जेनर के समय से शुरू होता है। 1976 में जेनर ने पाया कि जो महिलाएं डेयरी उद्योग में काम करती हैं और वे काऊपॉक्स से संक्रमित होती है, लेकिन उन्हें चेचक नहीं होता। अपनी अवधारणा को साबित करने के लिए उन्होंने फार्म में काम करने वाले एक युवा के बाएं हाथ में चीरा लगाकर उसे काऊपॉक्स के विषाणुओं से संक्रमित कर दिया। हालांकि इस लड़के को चेचक नहीं हुआ। इस बात की पुष्टि होने के बाद उन्होंने चेचक का टीका बनाया। यह बीमारी उन दिनों महामारी बनकर लाखों लोगों का जीवन असमय निगल जाती थी।

भारत में वैक्सीनेशन

भारत सरकार हर साल देश के लोगों को टीकाकरण का महत्व बताने के लिए राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस मनाती है। साल 1995 में पहली बार टीकाकरण दिवस हमारे देश में मनाया गया था। दरअसल 16 मार्च 1995 के दिन भारत सरकार ने देश में ‘पल्स पोलियों अभियान’ की शुरुआत की थी। सरकार ने इस योजना के जरिए देश से पोलियो को खत्म करने का लक्ष्य रखा था और तब से इस दिन हर साल पूरे देश में राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस मनाया जाने लगा।

वैक्सिनेशन के फायदे

टीकाकरण के जरिए बच्चों के शरीर को संक्रामक बीमारियों से लड़ने की ताकत मिलती है। जिन बच्चों को समय-समय पर टीकाकरण दिया जाता है उनको वह संक्रामक रोग होने की सम्भावना बेहद कम होती है। वहीं अगर किसी बच्चे का समय पर टीकाकरण ना करवाया जाए, तो उसे कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। वर्तमान में ऐसी तमाम बीमारियां हैं जिनके टीके काफी मशक्कत के बाद तैयार हुए। दशकों से उनके इस्तेमाल से हम सुरक्षित रहे हैं। कई महामारियों का नामोनिशां इन्हीं के द्वारा मिटाया गया है।

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ऐसे काम करता है टीका

टीका हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत करके शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को सक्रिय करने का काम करता है। इसके चलते जब बाहरी रोग शरीर में घुसने की कोशिश करते है तो हमारा इम्यून सिस्टम उससे लड़ पता है। अगर उसका खात्म नहीं काट पाता है तो कम से कम उसके असर को कम कर देता है। ज्यादातर टीके वायरल रोगों से निपटने के लिए तैयार किये जाते हैं लेकिन कुछ का निर्माण कैंसर के इलाज और रोकथाम में भी किया जाता है। सांप काटने के इलाज के अलावा नशामुक्ति के लिए भी टीके तैयार होते हैं।

प्रमुख वैक्सीन

न्युमोकोनिकल vaccine – यह वैक्सीन दो साल से कम उम्र के बच्चो को डॉक्टर लगाने की सलाह देते हैं। यह वैक्सीन न्युमोनिया के bacteria, मेनिन्जाईटिस (मस्तिष्क ज्वर) और कान के इन्फेक्शन से रक्षा करता हैं।

रोटावायरस (Rotavirus) – इस वैक्सीन की दो खुराक बच्चो को दी जाती हैं। यह 6 से 14 सप्ताह के बीच देनी होती हैं। यह रोटावायरस डायरिया से बचाता। यह इतनी गंभीर बीमारी हैं जिससे पूरी दुनिया के 3 से 5 साल के उम्र के 95% से अधिक बच्चे प्रभावित हैं।

एचपीवी (HPV) वैक्सीन – यह वैक्सीन सवाईकल कैंसर से बचाव करता हैं। यह वैक्सीन 9 – 10 साल की बालिकाओं को लगवाने की सलाह डॉक्टर देते हैं। इसमें IPV (पोलियो इंजेक्शन) व HIV (हेमोफाइलस इन्फुलुएंजा) को तीडेप इंजेक्शन के साथ मिक्स किया जाता हैं।

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