अटल सरकार से मोदी तक, भाजपा की पूरी कहानी

देश की सत्ताधारी सरकार भाजपा का गठन हुए आज 40 साल पूरे हो गए हैं। 6 अप्रैल 1980 को भाजपा की नींव रखी गयी थी। अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी युग तक भाजपा ने अपने 40 साल के संघर्ष में तमाम तरह के उतार चढ़ाव से गुजरते हुए शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है। 10 सदस्यों के साथ शुरू हुई भाजपा के पास आज देश में लगभग 18 करोड़ सदस्य हैं। केंद्र से लेकर 18 राज्यों में अपनी या गठबंधन की सरकार है और पार्टी के 303 लोकसभा सांसद हैं। भाजपा देश ही नहीं, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा भी करती है।

6 अप्रैल 1980 को अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विजयाराजे सिधिंया, सिकंदर बख्त जैसे नेताओं ने मिलकर भाजपा का गठन किया था। तब भाजपा की कमान अटल बिहारी वाजपेयी को सौंपी गई थी और पार्टी ने उनके नेतृत्व में सत्ता के शिखर तक पहुंचने का सपना देखा था। चार साल के बाद 1984 में चुनाव हुए तो भाजपा महज 2 सीटों पर सिमट गई। इस हार ने भाजपा को रास्ता बदलने पर मजबूर होना पड़ा और पार्टी की कमान कट्टर छवि के माने जाने वाले नेता लालकृष्ण आडवाणी को सौंपी गई।

आडवाणी के कंधों पर अब भाजपा के नेतृत्व की जिम्मेदारी थी तो पार्टी पर नियंत्रण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का था। आडवाणी हिंदुत्व व राममंदिर मुद्दे को लेकर आगे बढ़े और इसके बाद ये रास्ता बनता हुआ सत्ता से शीर्ष तक चलता चला गया। भाजपा को संजीवनी 1989 के लोकसभा चुनाव में मिली। भाजपा दो सीटों से सीधे देश में दूसरे नंबर की पार्टी बन गई।

हिमाचल के पालमपुर में भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में1988 में अयोध्या मुद्दे को पार्टी के एजेंडे में शामिल किया गया। सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा ने भाजपा में नई ऊर्जा का संचार किया और आडवाणी की लोकप्रियता भी बढ़ी और वह संघ से लेकर पार्टी की नजर में काफी बुलंदी पर पहुंच गए। हालांकि, इसी दौरान छह दिसंबर को अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने का मामला हुआ था और आडवाणी का नाम ‘जैन हवाला डायरी’ में आ गया।

इसके चलते भाजपा और संघ परिवार ने आडवाणी के बजाय उदारवादी छवि वाले अटल बिहारी वाजपेयी के चेहरे के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया। 1995 में मुंबई अधिवेशन में वाजपेयी को भाजपा का पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। हालांकि, पार्टी की कमान आडवाणी के हाथों में रही। अटल-आडवाणी की जोड़ी ने भाजपा को शून्य से शिखर तक पहुंचाने का काम किया।

भाजपा ने 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में पहली बार 13 दिन की सरकार बनाई। इसके बाद 1998 में पार्टी की 13 महीने तक सरकार चली। 1999 में फिर एक ऐसा समय आया, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने बतौर पीएम अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। इस तरह वह सबसे लंबे समय तक गैर-कांग्रेसी पीएम रहे, लेकिन 2004 में भाजपा की सत्ता में वापसी नहीं करा सके। इसके चलते भाजपा को 10 साल तक सत्ता का वनवास झेलना पड़ा।

2011 में देश के 9 राज्यों में भाजपा की सरकार थी। 2013 में राजनाथ फिर पार्टी अध्यक्ष बने और यहीं से भाजपा में मोदी युग की शुरुआत हुई। भाजपा अध्यक्ष ने गुजरात के तत्कालीन पीएम नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव के लिए पीएम उम्मीदवार चुना। फिर मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने वो कर दिखाया, जो अभी तक नहीं हुआ था। 2014 में भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत का आंकड़ा पार किया और आसानी से सरकार बनाई।

2014 में नरेंद्र मोदी के पीएम और अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष बनने के साथ ही भाजपा की तीन धरोहर अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर के युग की समाप्ति हो गई। अब भाजपा में मोदी युग चल रहा है। पार्टी का नेता ही नहीं संगठन, चुनाव लड़ने का तरीका, सरकार चलाने का तौर तरीका, फैसले लेने और उन्हें शिद्दत से लागू करने की तत्परता, बीजेपी की नई पहचान बन गई। भाजपा अकेले या सहयोगियों के साथ सत्ता की उस ऊंचाई पर है, जहां पहुंचने का उसके संस्थापकों ने कल्पना भी नहीं की होगी। भाजपा दूसरी बार पूर्णबहुमत के साथ सत्ता में है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जो सपने देखे मोदी ने उन्हें पूरा किया है। कश्मीर से 370 हटाने से लेकर तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने तक निर्णय मोदी सरकार में हुआ है। मोदी दूसरी बार पीएम है तो अमित शाह गृहमंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उसी तरह जैसे अटल बिहारी वाजपेयी पीएम थो तो लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे, लेकिन तब और अब में एक बड़ा फर्क है। उस समय सहयोगी दलों का दबाव था, लेकिन मोदी सरकार में ऐसा नहीं है।

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