अमेरिका में कच्चे तेल का भाव 0 से भी नीचे, भारत के लिए क्यों है चिंताजनक?

34 साल बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि कच्चे तेल के भाव जीरो से भी नीचे चले गए हैं। अमेरिकी बेंचमार्क क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमतों में इतिहास की यह सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गयी है। कोरोना के प्रकोप की वजह से अमेरिका में कच्चे तेल की मांग में आई भारी गिरावट की वजह से WTI का वायदा भाव सोमवार को -$37.63 प्रति बैरल के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।

भारत की निर्भरता ब्रेंट क्रूड की सप्लाई पर है, न कि WTI की। ब्रेंट का दाम अब भी 20 डॉलर के ऊपर बना हुआ है। गिरावट सिर्फ WTI के मई वायदा में दिखाई दी, जून वायदा अब भी 20 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है। लिहाजा भारत पर अमेरिकी क्रूड में गिरावट होने का खास असर नहीं होगा। लेकिन कच्चे तेल के दाम से कैसे भारत पर असर पड़ता है।

क्या हुआ अमेरिकी बाजार में?
सोमवार को अमे​रिका के वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) बाज़ार में कच्चा तेल मई के वायदा सौदों के लिए गिरते हुए माइनस 37.63 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। सबसे पहले यह समझ लें कि इसका मतलब क्या है। यह रेट मौजूदा यानी तत्काल के हाजिर बाजार के लिए नहीं है। यह वायदा बाजार के लिए है।

दुनियाभर में लॉकडाउन को मद्देनज़र रखते हुए जिन कारोबारियों ने मई के लिए वायदा सौदे किए हैं वे अब इसे लेने को तैयार नहीं हैं। उनके पास पहले से इतना तेल जमा पड़ा है जिसकी खपत नहीं हो रही है। इसलिए उत्पादक उन्हें अपने पास से रकम देने को तैयार हैं कि आप हमसे खर्च ले लो, लेकिन कच्चा तेल ले जाओ यानी सौदे को पूरा करो। ऐसा कच्चे तेल के इतिहास में पहली बार हुआ है।

इसके अगले महीने यानी जून के कॉन्ट्रैक्ट के लिए WTI क्रूड की कीमत 22.15 डॉलर प्रति बैरल थी। यानी एक महीने के ही अंतर्गत वायदा सौदे में प्रति बैरल लगभग 60 डॉलर का अंतर दिख रहा है।

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भारत पर क्या होता है प्रभाव?
अमेरिकी बाजार में कच्चा तेल अगर मुफ्त भी हो जाता है तो पेट्रोलियम कीमतों के लिहाज से भारत को बहुत फर्क क्यों नहीं पड़ता। क्योंकि भारत में जो तेल आता है वह लंदन और खाड़ी देशों का एक मिश्रित पैकेज होता है जिसे इंडियन क्रूड बास्केट कहते हैं। इंडियन क्रूड बास्केट में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा ओपेक देशों का और बाकी ब्रेंट क्रूड लंदन तथा अन्य देशों का होता है। यही नहीं दुनिया के लगभग 75 प्रतिशत तेल डिमांड का रेट ब्रेंट क्रूड से तय होता है। यानी भारत के लिए ब्रेंट क्रूड की कीमत महत्व रखती है, अमेरिकी क्रूड का नहीं।

सोमवार को जून के लिए ब्रेंट क्रूड का भाव लगभग 26 डॉलर प्रति बैरल था, जबकि मई के लिए ब्रेंट क्रूड वायदा भाव लगभग 23 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था। इसमें भी गिरावट आई, लेकिन यह बहुत अधिक नहीं लुढ़का।

हाजिर बाजार यानी आज के भाव की चर्चा करें तो ब्रेंट क्रूड लगभग 25 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रहा है और इंडियन बॉस्केट का क्रूड लगभग 20 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रहा है। यानी भारत के लिए कच्चा तेल अब भी 20 डॉलर प्रति बैलर के आसपास है।

WTI वह क्रूड ऑयल होता है, जिसे अमेरिका के कुंओं से निकाला जाता है। ढुलाई के लिहाज से इसे भारत लाना आसान नहीं होता। सबसे अच्छी क्वालिटी का कच्चा तेल ब्रेंट क्रूड माना जाता है। दूसरी ओर, खाड़ी देशों का यानी दुबई/ओमार क्रूड ऑयल थोड़ी हल्की क्वालिटी का होता है, लेकिन यह एशियाई बाजारों में काफी लोकप्रिय है।

ब्रेंट क्रूड और WTI क्रूड की कीमत में अक्सर कम से कम 10 डॉलर प्रति बैरल का अंतर दर्ज किया जाता रहा है। इस कीमत पर ओपेक देशों का काफी प्रभाव होता है।

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भारत में कैसे तय होती है कीमत
जब भी कच्चा तेल गिरता है तो चारों ओर यह शोर मचने लगता है कि पेट्रोल-डीजल के रेट कम क्यों नहीं हो रहे। भारत में पेट्रोल-डीजल के भाव क्रूड के ऊपर नीचे जाने से तय नहीं होते। पेट्रोलियम कंपनियां हर दिन दुनिया में पेट्रोल-डीजल का एवरेज रेट देखती हैं। यहां कई तरह के केंद्र और राज्य के टैक्स निश्चित हैं। भारतीय बॉस्केट के क्रूड रेट, अपने बहीखाते, पेट्रोलियम-डीजल के औसत इंटरनेशनल रेट आदि को ध्यान में रखते हुए पेट्रोलियम कंपनियां तेल का भाव तय करती हैं। इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का हमारे यहां पेट्रोल-डीजल की कीमत पर तत्काल प्रभाव नहीं होता।

लेकिन क्या है बड़ी चिंता
एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि भारत या दुनिया की इकोनॉमी के लिए यह कोई शुभ संकेत नहीं है। उन्होंने कहा, ‘कोरोना संकट की वजह से दुनिया की अर्थव्यवस्था पस्त है। भारत में भी लॉकडाउन की वजह से पेट्रोलियम की मांग में भारी गिरावट आई है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों का लगातार घटते जाना और इस स्तर पर चले जाना खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था के डांवाडोल हो जाने का खतरा पैदा करता है। खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तेल पर निर्भर है। वहां लगभग 80 लाख भारतीय काम करते हैं जो हर साल लगभग 50 अरब डॉलर की रकम भारत भेजते हैं। वहां की अर्थव्यवस्था गड़बड़ होने का मतलब है इस रोजगार का संकट में आना।’

तनेजा ने कहा, ‘इसके अलावा भारत के निर्यात का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों को जाता है, तो वहां की अर्थव्यवस्था के डांवाडोल होने का मतलब है भारत के निर्यात पर बड़ी चोट पड़ना और मौजूदा अर्थव्यवस्था की जो हालत है उसे देखते हुए यह बड़ी चोट होगी।’

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