खतरें में है चौथे स्तंभ की जान!

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खबर_संवाददाता - Shaini

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कर्नाटक के बंगलुरु में एक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई है। कुछ बदमाशों ने इस हादसे को कैसे अंजाम दिया पहले जानते है गौरी लंकेश की मर्डर मिस्ट्री। आखिर क्यो गौरी को मारा गया।

 

कर्नाटक की वरिष्ठ महिला पत्रकार गौरी लंकेश की कल बेंगलूरु में कुछ अज्ञात हमलावरों ने उनके घर के बाहर ही उन्हे गोली मारकर हत्या कर दी थी. गौरी लंकेश को बाइक पर सवार हमलावरों ने बीती रात उस वक्त गोली मारी, जब वो दफ्तर से लौटकर अपने घर का दरवाज़ा खोलने जा रही थीं. फायरिंग के दौरान उनके सिर, गर्दन और सीने पर गोलियां लगीं हैं।

 

आखिर कौन है गौरी लंकेश

बता दे कि 55 साल की गौरी लंकेश कन्नड़ भाषा की मशहूर पत्रकार और गौरी लंकेश पत्रिके नाम की लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिका की संपादक थीं। या यू कहे गौरी लंकेश कर्नाटक में पत्रकारिता का निडर और निर्भीक चेहरा थीं।  इसके साथ ही वो अखबारों में कॉलम भी लिखती थीं। टीवी न्यूज चैनल डिबेट्स का भी हिस्सा रहती थी। लंकेश सोशल मीडिया पर भी एक्टिव रहती है वो अपनी सोच को खुल कर लोगो के साथ शेयर करती थी। लंकेश के दक्षिणपंथी संगठनों से वैचारिक मतभेद जगजाहिर थे, जिसकी वजह से उन्हें धमकियां मिलती रहती थीं. कुछ ही वक्त पहले उन्हें उनके लिखे गए आर्टिकल की  वजह से मुकदमा भी झेलना पड़ा था।

 

गौरी लंकेश सोशल मीडिया से भी जुड़ी रहती है वो अपनी सोच को सबके सामने रखती है, उनकी मौत से भी पहले उन्होने फेक न्यूज को लेकर एक ट्वीट किया था। इस हादसे के बाद हर कोई गुस्से मे है, क्या भारत में इसी तरह कियी को बोलने की आजडादी नही है इस देश में इसी तरह किसी को मुंह बंद कराया जाता है यह सिर्फ एक गौरी की बात नही ऐसे मामले पहले भी आए जिनकी सोच को इस कदर कुचला गया है।

 

गौरी लंकेश की हत्या के बाद लोगों में गुस्सा भरा है, कई लोग इस घटना की कड़ी आलोचना कर रहे है। करेंगे भी क्यो नही जो आगे बढ़ कर अपनी सोच रखेगा शायद इसी तरह भारत जैसे स्वतंत्र देश में सोच को इस तरह कुचला जाएगा। गौरी लंकेश पहले भी धमकियों का जिक्र कर चुकी थीं,

घटना के बाद पत्रकार जगत और सिविल सोसायटी में शोक की लहर है. प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, एनबीए और फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स ने जानलेवा हमले पर नाराजगी जताई है और इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया है। हमले के विरोध में कई संगठन जुट रहे हैं और बंगलुरु में विरोध प्रदर्शन की भी खबर है। लोगों ने कैंडिल मार्च भी निकाला, लेकिन यह सिर्फ एक गौरी की बात नही यह उन तमाम रिपोर्टर की बात है जिन्होने अपनी बात तो रखी लेकिन इनकी सोच को इस कदर दबा दिया गया, उन्हे खामोश कर दिया गया। 

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एम एम कलबुर्गी

वही कन्नड़ के पत्रकार एम एम कलबुर्गी प्रसिद्ध कन्नड विद्वान और हम्पी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति थे। कलबुर्गी के साथ भी यही हुआ जो गौरी के साथ हुआ, कलबर्गी  के घर दो जवान मोटरसाइकिल से आए और  कलबुर्गी के छात्र बताकर पत्रकार के सीने में गोलिया दाग दी। लेकिन हत्यारो का कोई सुराग नही मिला है और यह मामला भी सीबीआई के जांच की फाइल में दब कर रह गया। कहा गया था कि कलबर्गी ने मूर्तिपूजा के विरोध में एक बयान दिया था जिसके बाद कुछ दक्षिणपंथी हिन्दू संगठनों ने विरोध और ग़ुस्सा जताया था।

 

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गोविंद पनसारे

 

2015 में ही सामाजिक कार्यकर्ता गोविंद पनसारे के साथ भी कुछ यू ही हुआ, पनसारे की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इतना ही नहीं उनकी पत्नी को भी हमलावरों ने निशाना बनाया था। जांच के बाद राइट विंग से जुड़े कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

 

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नरेंद्र दाभोलकर

 

वहीं इससे 2 साल पहले 2013 में पुणे में नरेंद्र दाभोलकर को भी गोलियों दागी थी। नरेंद्र दाभोलकर तर्कवादी और महाराष्ट्र के लेखक थे। वे अंधविश्वास और कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाते थे। जिसकी वजह से अन्य दक्षिणपंथियों के निशाने पर रहते थे।