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प्रजातंत्र ने खत्म किया देश से राजतंत्र

इस लोकसभा चुनाव की चर्चा काफी समय से थी। हर किसी को इंतजार था तो सिर्फ चुनाव के नतीजे जानने का। लोकतंत्र का मतलब ही होता है लोगों के लिए, लोगो के द्वारा किया गया और इस बार कुछ ऐसा ही देखा गया। चुनाव के नतीजे देख साफ दिखा है प्रजातंत्र का जादू।

दरअसल, इस बार चुनाव में राजतंत्र पर प्रजातंत्र भारी पडता नजर आया। कई ऐसे दिग्गजों का हार का सामना पड़ा जिनकी हार किसी ने सोची भी नही थी।

  • दिग्विजय सिंह

मालूम हो कि दिग्विजय सिंह 10 साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, उसके बावजूद वो सांसद का चुनाव हार गए, वो अपनी ही सीट नहीं बचा पाए। 2003 तक मुख्यमंत्री रहने के बाद वो साल 2019 तक न तो कोई चुनाव लड़े न जीते। अब जब 2019 में सांसद का चुनाव लड़ने की तैयारी की तो एक साध्वी ने उनको हरा दिया।

गौरतलब है कि भाजपा ने मालेगांव कांड में आरोपित साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को टिकट दिया, साध्वी ने ही उनको हराया। साध्वी ने चुनाव प्रचार के दौरान कई विवादित बयान भी दिए उसके बाद भी वो चुनाव जीत गई।

  • ज्योतिरादित्य सिंधिया

गुना से कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। जिसके बाद उन्होंने ट्वीट कर भाजपा प्रत्याशी केपी यादव को बधाई दी है। हार स्वीकार करने के बाद ज्योतिरादित्य, सिंधिया परिवार के पहले सदस्य हो गए हैं जो चुनाव हारे। इससे पहले इस परिवार का कोई सदस्य गुना और ग्वालियर संसदीय सीट से चुनाव नहीं हारा। यहां तक की अगर परिवार का कोई सदस्य चुनाव नहीं भी लड़ा तो भी वही प्रत्याशी जीता, जिसे सिंधिया ने चाहा।

बता दें कि सिंधिया रियासत के भारत में विलय के बाद यहां राजमाता विजयराजे सिंधिया कांग्रेस में शामिल हो गईं। इंदिरा गांधी से पटरी नहीं बैठ पाने के कारण वे जनसंघ में शामिल हो गईं। समय के साथ सिंधिया परिवार राजनीतिक रूप से बंट गया। उनके बेटे माधवराव सिंधिया भाजपा छोड़कर कांग्रेस में चले गए।

वहीं, गुना-शिवपुरी और ग्वालियर इन दो लोकसभा क्षेत्रों की राजनीति सिंधिया राजवंश के इर्द-गिर्द घूमती रही है। विजियाराजे सिंधिया उनके पुत्र माधवराव सिंधिया और अब ज्योतिरादित्य सिंधिया इसके केंद्र में रहे हैं। सिंधिया घराने की राजनीतिक मैदान में उतर चुनाव लड़ने की शुरुआत भी गुना से ही हुई। विजियाराजे सिंधिया, माधवराव सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने जीवन का पहला चुनाव यहीं से लड़ा।

  • राहुल गांधी

राहुल गांधी जो कहीं न कहीं खुद को कांग्रेस के शहजादे समझते हैं, जो हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष लोकिन अपनी ही संसदीय सीट से हार गए।

दरअसल, लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस के राहुल गांधी के हाथों नजदीकी हार के बाद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अमेठी को अपना दूसरा घर बना लिया। पांच वर्ष की मेहनत का परिणाम उनको कल मिला, जब उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को शिकस्त दी। पहले ही चरण में बढ़त लेने वाली स्मृति ईरानी को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जीत के लिए बधाई देने के साथ ही अमेठी का विकास करने की भी सलाह दी।

बता दें कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को केंद्रीय मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने 54731 मतों से शिकस्त देकर कांग्रेस की परंपरागत अमेठी सीट जीत ली। यहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के बीच सीधा मुकाबला था। चुनावी घमासान में दोनों ही दलों ने अमेठी सीट पर जीत दर्ज करने के लिए पूरी मेहनत की थी। राहुल-प्रियंका के साथ ही सोनिया ने भी अमेठी में वोट मांगे थे तो स्मृति के साथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने रोड शो कर अमेठी की आवाम से समर्थन मांगा था।

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