जानिए कैसे लाए बच्चे के व्यक्तित्व में अच्छे संस्कार

अक्सर हम आज के समय में ये देख रहे है कि आजकल बच्चे बढ़ो को देखकर भी उन्हें नज़र अंदाज़ करते हुए आगे निकल जाते, किसी की मदद न करना, बातचीत में असभ्य भाषा का इस्तेमाल और दूसरों की असुविधा का खयाल न रखना। यह सब देखकर आपको भी बहुत बुरा लगता होगा लेकिन खास उम्र के बाद उनके व्यवहार में बदलाव लाना मुश्किल है। लेकिन अगर आपके बच्चे छोटे है और आप चाहते हो कि उनको अच्छी परवरिश देना चाहते हैं तो हमारी इन बातो पर गोर करे।अगर आप प्ले स्कूल जाने वाले नन्हे बच्चे की मां हैं और भविष्य में उसे ऐसी आदतों से बचाना चाहती हैं तो उसकी परवरिश के प्रति सचेत रहें ताकि उसके व्यक्तित्व में अच्छे संस्कारों के बीज विकसित हों।

* घर है पहला स्कूल- ध्यान रखिये बच्चे का पहला स्कूल उसका घर होता हैं। ऐसा देखा गया है कि आमतौर पर दो-ढाई साल की उम्र में बच्चे बड़ों के निर्देशों को समझने लगते हैं और उनमें अच्छी आदतें विकसित करने के लिए इसी उम्र से पेंरेंट्स को सचेत हो जाना चाहिए। बता दे कि भाई-बहनों या दोस्तों के साथ छीना-झपटी और मारपीट जैसी आदतों को ज्य़ादातर पेरेंट्स बाल सुलभ हरकतें समझकर अनदेखा कर देते हैं पर बाद में उन्हें बदलना मुश्किल हो जाता है। वही एक रिपोर्ट के अनुसार ऐसा माना गया है कि यही ऐसी उम्र है, जब बच्चों को शेयरिंग सिखाने की ज़रूरत होती है।

* प्ले ग्राउंड में अनुशासन-  अच्छी परवरिश के लिए रोज़ाना शाम को बच्चों को अपने साथ पार्क जैसे किसी सार्वजनिक स्थल पर ज़रूर ले जाएं। उनके समाजीकरण के लिए यह बहुत ज़रूरी है। वही उधर अगर वह किसी दोस्त को धक्का देकर गिराने या उसके साथ मारपीट जैसी हरकतें करे तो इसे बच्चे की मासूम शरारत समझकर इग्नोर न करें, बल्कि उसे प्यार से समझाएं कि अगर कोई तुम्हारे साथ भी ऐसा करे तो तुम्हें कैसा लगेगा? इससे बच्चों में इम्पैथी यानी दूसरों की तकलीफ समझने की भावना विकसित होगी। पार्क में कई बार बच्चे झूले पर सबसे पहले बैठने के लिए मचलने लगते हैं। ऐसे में आप उन्हें अपनी बारी का इंतज़ार करना सिखाएं। साथ ही बच्चों को यह बताना भी बहुत ज़रूरी है कि सभी को खेलने का समान अवसर मिलना चाहिए। इस तरह खेल-खेल में बच्चे अनुशासन के नियम भी सीख जाएंगे।

* सिखाएं एंगर मैनेजमेंट- छोटी-छोटी बातों के लिए बच्चों का रूठना या ज़िद करना स्वाभाविक है। उनके ऐसे किसी व्यवहार पर ओवर रिएक्ट करने के बजाय धीरे-धीरे उन्हें यह समझाना बहुत ज़रूरी है कि तुम्हारी हर बात नहीं मानी जाएगी। कई बार बच्चे गुस्से में तोडफ़ोड़ या मारपीट जैसे हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। अगर कभी आपका बच्चा रो-चिल्लाकर किसी चीज़ के लिए जि़द करे तो उस वक्त उसकी कोई भी मांग पूरी न करें। इससे उस तक यह गलत संदेश जाएगा कि जि़द करके मम्मी-पापा से अपनी हर बात मनवाई जा सकती है। ऐसी स्थिति में पहले उससे शांत रहने को कहें। फिर जब वह शालीनतापूर्वक आपके सामने अपनी कोई मांग रखता है तभी उसकी बात मानें।

* सिखाएं विनम्रता का पाठ- केवल परिवार के साथ ही नहीं बल्कि आसपास के उन सभी लोगों के प्रति विनम्र व्यवहार अपनाना चाहिए, जो किसी न किसी भी रूप में हमारे मददगार होते हैं। मसलन घरेलू सहायक, ड्राइवर, सफाई कर्मचारी और सिक्युरिटी गार्ड आदि। बच्चे को समझाएं कि ये सभी लोग हमारी मदद करते हैं, इसलिए हमें इनके साथ प्यार से पेश आना चाहिए। उसमें ऐसी आदत विकसित करें कि वह ऐसे लोगों के लिए अंकल-आंटी या भैया-दीदी जैसे सम्मान सूचक संबोधनों का प्रयोग करे। अगर आप रोज़मर्रा के सामान खरीदने बाज़ार जाती हैं तो अपने बच्चे को भी अपने साथ लेकर जाएं। उसे सिखाएं कि अगर रास्ते में कोई परिचित अंकल-आंटी मिलें तो उन्हें नमस्ते ज़रूर करना चाहिए। इससे उसे सामाजिक व्यवहार सीखने में मदद मिलेगी।

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